आज का हिन्दू पंचांग | दिनांक 23 जुलाई 2020

**🌞 ~ आज का हिन्दू पंचांग ~ 🌞

⛅️ दिनांक 23 जुलाई 2020

⛅️ दिन – गुरुवार
⛅️ विक्रम संवत – 2077 (गुजरात – 2076)
⛅️ शक संवत – 1942
⛅️ अयन – दक्षिणायन
⛅️ ऋतु – वर्षा
⛅️ मास – श्रावण
⛅️ पक्ष – शुक्ल
⛅️ तिथि – तृतीया शाम 05:03 तक तत्पश्चात चतुर्थी
⛅️ नक्षत्र – मघा शाम 05:44 तक तत्पश्चात पूर्वाफाल्गुनी
⛅️ योग – व्यतिपात दोपहर 12:03 तक तत्पश्चात वरीयान्
⛅️ राहुकाल – दोपहर 02:12 से शाम 03:51 तक
⛅️ सर्योदय – 06:10
⛅️ सर्यास्त – 19:20
⛅️ दिशाशूल – दक्षिण दिशा में
⛅️ वरत पर्व विवरण –

💥 विशेष – तृतीया को परवल खाना शत्रुओं की वृद्धि करने वाला है।(ब्रह्मवैवर्त पुराण, ब्रह्म खंडः 27.29-34)

🌷 पण्यदायी तिथियाँ 🌷

➡️ 11 अगस्त : जन्माष्टमी (स्मार्त)

➡️ 12 अगस्त : जन्माष्टमी (भागवत) (20 करोड़ एकादशी व्रतों के समान अकेला जन्माष्टमी का व्रत है – भगवान श्रीकृष्ण । जन्माष्टमी के दिन पूरी रात जागरण करके ध्यान, जप आदि करना महापुण्यदायी है ।), बुधवारी अष्टमी (सूर्योदय से दोपहर 11:17 तक)

➡️ 15 अगस्त : अजा एकादशी (समस्त पापनाशक व्रत, माहात्म्य पढ़ने-सुनने से अश्वमेध यज्ञ का फल)

➡️ 16 अगस्त : विष्णुपदी संक्रांति (पुण्यकाल दोपहर 12:43 से सूर्यास्त तक)(ध्यान, जप, व पुण्यकर्म का लाख गुना फल)

➡️ 22 अगस्त : गणेश चतुर्थी (चन्द्र-दर्शन निषिद्व चन्द्रस्त – रात्रि 09:49) (ॐ गं गणपतये नम: । का जप करने और गुड़मिश्रित जल से गणेशजी को स्नान कराने एवं दूर्वा व सिंदूर की आहुति देने से विध्न-निवारण होता है तथा मेधाशक्ति बढ़ती है ।)

➡️ 26 अगस्त :बुधवारी अष्टमी (सूर्योदय से सुबह 10:40 तक)

➡️ 29 अगस्त : पद्मा एकादशी (व्रत करने व माहात्म्य पढ़ने-सुनने से सब पापों से मुक्ति)

➡️ 01 सितम्बर : महालय श्राद्धारम्भ (श्राद्ध पक्ष 01 सितम्बर से 17 सितम्बर तक)

🙏🏻 लोक कल्याण सेतु जुलाई 2020 से

🌷 नागपंचमी 🌷

श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को नागपंचमी का पर्व मनाया जाता है। इस बार ये पर्व 25 जुलाई, शनिवार को है। इस दिन नागों की पूजा करने का विधान है।

हिंदू धर्म में नागों को भी देवता माना गया है। महाभारत आदि ग्रंथों में नागों की उत्पत्ति के बारे में बताया गया है। इनमें शेषनाग, वासुकि, तक्षक आदि प्रमुख हैं।

नागपंचमी के अवसर पर हम आपको ग्रंथों में वर्णित प्रमुख नागों के बारे में बता रहे हैं-

वासुकि नाग

धर्म ग्रंथों में वासुकि को नागों का राजा बताया गया है। ये हैं भगवान शिव के गले में लिपटे रहते हैं। (कुछ ग्रंथों में महादेव के गले में निवास करने वाले नाग का नाम तक्षक भी बताया गया है)।

ये महर्षि कश्यप व कद्रू की संतान हैं। इनकी पत्नी का नाम शतशीर्षा है।

इनकी बुद्धि भगवान भक्ति में लगी रहती है। जब माता कद्रू ने नागों को सर्प यज्ञ में भस्म होने का श्राप दिया तब नाग जाति को बचाने के लिए वासुकि बहुत चिंतित हुए।

तब एलापत्र नामक नाग ने इन्हें बताया कि आपकी बहन जरत्कारु से उत्पन्न पुत्र ही सर्प यज्ञ रोक पाएगा।

तब नागराज वासुकि ने अपनी बहन जरत्कारु का विवाह ऋषि जरत्कारु से करवा दिया। समय आने पर जरत्कारु ने आस्तीक नामक विद्वान पुत्र को जन्म दिया।

आस्तीक ने ही प्रिय वचन कह कर राजा जनमेजय के सर्प यज्ञ को बंद करवाया था। धर्म ग्रंथों के अनुसार, समुद्र मंथन के समय नागराज वासुकि की नेती (रस्सी) बनाई गई थी।

त्रिपुरदाह (इस युद्ध में भगवान शिव ने एक ही बाण से राक्षसों के तीन पुरों को नष्ट कर दिया था) के समय वासुकि शिव धनुष की डोर बने थे।

शेषनाग

शेषनाग का एक नाम अनंत भी है। शेषनाग ने जब देखा कि उनकी माता कद्रू व भाइयों ने मिलकर विनता (ऋषि कश्यप की एक और पत्नी) के साथ छल किया है तो उन्होंने अपनी मां और भाइयों का साथ छोड़कर गंधमादन पर्वत पर तपस्या करनी आरंभ की।

उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्मा ने उन्हें वरदान दिया कि तुम्हारी बुद्धि कभी धर्म से विचलित नहीं होगी।

बरह्मा ने शेषनाग को यह भी कहा कि यह पृथ्वी निरंतर हिलती-डुलती रहती है, अत: तुम इसे अपने फन पर इस प्रकार धारण करो कि यह स्थिर हो जाए।

इस प्रकार शेषनाग ने संपूर्ण पृथ्वी को अपने फन पर धारण कर लिया। क्षीरसागर में भगवान विष्णु शेषनाग के आसन पर ही विराजित होते हैं।

धर्म ग्रंथों के अनुसार, भगवान श्रीराम के छोटे भाई लक्ष्मण व श्रीकृष्ण के बड़े भाई बलराम शेषनाग के ही अवतार थे।

शरावण मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को नागपंचमी का पर्व मनाया जाता है।

इस बार ये पर्व 25 जुलाई, शनिवार को है। इस दिन नागों की पूजा करने का विधान है।

हिंदू धर्म में नागों को भी देवता माना गया है।

महाभारत आदि ग्रंथों में नागों की उत्पत्ति के बारे में बताया गया है। इनमें शेषनाग, वासुकि, तक्षक आदि प्रमुख हैं। नागपंचमी के अवसर पर हम आपको ग्रंथों में वर्णित प्रमुख नागों के बारे में बता रहे हैं-

तक्षक नाग

धर्म ग्रंथों के अनुसार, तक्षक पातालवासी आठ नागों में से एक है।

तक्षक के संदर्भ में महाभारत में वर्णन मिलता है। उसके अनुसार, श्रृंगी ऋषि के शाप के कारण तक्षक ने राजा परीक्षित को डसा था, जिससे उनकी मृत्यु हो गयी थी।

तक्षक से बदला लेने के उद्देश्य से राजा परीक्षित के पुत्र जनमेजय ने सर्प यज्ञ किया था। इस यज्ञ में अनेक सर्प आ-आकर गिरने लगे।

यह देखकर तक्षक देवराज इंद्र की शरण में गया।

जैसे ही ऋत्विजों (यज्ञ करने वाले ब्राह्मण) ने तक्षक का नाम लेकर यज्ञ में आहुति डाली, तक्षक देवलोक से यज्ञ कुंड में गिरने लगा। तभी आस्तिक ऋषि ने अपने मंत्रों से उन्हें आकाश में ही स्थिर कर दिया।

उसी समय आस्तिक मुनि के कहने पर जनमेजय ने सर्प यज्ञ रोक दिया और तक्षक के प्राण बच गए।

कर्कोटक नाग

कर्कोटक शिव के एक गण हैं।
पौराणिक कथाओं के अनुसार, सर्पों की मां कद्रू ने जब नागों को सर्प यज्ञ में भस्म होने का श्राप दिया तब भयभीत होकर कंबल नाग ब्रह्माजी के लोक में, शंखचूड़ मणिपुर राज्य में, कालिया नाग यमुना में, धृतराष्ट्र नाग प्रयाग में, एलापत्र ब्रह्मलोक में और अन्य कुरुक्षेत्र में तप करने चले गए।

ब्रह्माजी के कहने पर कर्कोटक नाग ने महाकाल वन में महामाया के सामने स्थित शिव लिंग की स्तुति की। शिव ने प्रसन्न होकर कहा- जो नाग धर्म का आचरण करते हैं, उनका विनाश नहीं होगा।

इसके बाद कर्कोटक नाग उसी शिवलिंग में प्रवेश कर गया।

तब से उस लिंग को कर्कोटेश्वर कहते हैं।

मान्यता है कि जो लोग पंचमी, चतुर्दशी और रविवार के दिन कर्कोटेश्वर शिवलिंग की पूजा करते हैं उन्हें सर्प पीड़ा नहीं होती।

कालिया नाग

श्रीमद्भागवत के अनुसार, कालिया नाग यमुना नदी में अपनी पत्नियों के साथ निवास करता था। उसके जहर से यमुना नदी का पानी भी जहरीला हो गया था। श्रीकृष्ण ने जब यह देखा तो वे लीलावश यमुना नदी में कूद गए।

यहां कालिया नाग व भगवान श्रीकृष्ण के बीच भयंकर युद्ध हुआ। अंत में श्रीकृष्ण ने कालिया नाग को पराजित कर दिया। तब कालिया नाग की पत्नियों ने श्रीकृष्ण से कालिया नाग को छोडऩे के लिए प्रार्थना की।

तब श्रीकृष्ण ने उनसे कहा कि तुम सब यमुना नदी को छोड़कर कहीं और निवास करो।

श्रीकृष्ण के कहने पर कालिया नाग परिवार सहित यमुना नदी छोड़कर कहीं और चला गया।

इनके अलावा कंबल, शंखपाल, पद्म व महापद्म आदि नाग भी धर्म ग्रंथों में पूज्यनीय बताए गए हैं।

🌞 ~ हिन्दू पंचांग ~ 🌞

Source: Astrology Group

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