उत्तराषाढ़ा चरण फल

AkashVani Nakshatra

उत्तराषाढ़ा नक्षत्र

प्रथम चरण

इसका स्वामी गुरु है। इसमे गुरु, सूर्य, गुरु का प्रभाव है। धनु 266।00 से 270।00 अंश। नवमांश धनु। यह संचार, विश्वास, खर्चीलेपन का द्योतक है। जातक सौम्य, गौर वर्ण, अश्व मुखी, लम्बे असित नेत्र, टेडी जांघ वाला, अल्प भाषी, स्त्री से दुःखी होता है।

इस पाद में जातक ईमानदार, सत्यवादी, मायावादी, समाज की धरोहर, सद्चरित्र, निम्न स्तर के लोगो को नही चाहने वाला, ब्रम्हवादी, बहुत ज्यादा कठोर या अभेद्य होता है।

द्वितीय चरण

इसका स्वामी शनि है। इसमे शनि, सूर्य, शनि का प्रभाव है। मकर 270।00 से 273।00 अंश। नवमांश मकर। यह भौतिकवाद, व्यक्तित्वता, सांसारिकता का द्योतक है। जातक छिंदे दांत वाला, श्याम वर्ण, मोटी-फटी आवाज वाला, घने केश, ख़राब नख, गीतकार, विनोदी, शक्तिशाली होता है।

जातक दिल से मजबूत होता है इस कारण इसे ठण्डे खून वाला कहते है। यह लक्ष को पूरा करने वाला, ईश्वर मे विश्वास करने वाला किन्तु अन्य पादो की अपेक्षा आंशिक आध्यात्मिक होता है। यह गहन विचार के बाद बोलने वाला, प्रबल संचार वाहक, शक्तिवान होता है।

तृतीय चरण

इसका स्वामी शनि है। इसमे शनि, सूर्य, शनि का प्रभाव है। मकर 273।20 से 276।40 अंश। नवमांश कुम्भ। यह परिवार, संचय, एकीकृत का द्योतक है। जातक टेडी नाक, विशाल देह, आलसी, धूर्त, बहुत सी स्त्रियों से प्रेम करने वाला, गीत मे रत, बकवादी, दृढ़ प्रतिज्ञा वाला होता है।

इस पाद मे जातक कठिन कार्य करने वाला, उदार हृदयी, समाज को समय देने वाला, दल के सम्मानीय व्यक्तियो से आदर पाने वाला, आवश्यकता की शीघ्र पूर्ति का इच्छावान, घटना होने तक धैर्य पूर्वक इन्जार करने वाला, विवाह के पश्चात मस्का मारने वाली स्त्रियो का तिरस्कार करने वाला होता है।

चतुर्थ चरण

इसका स्वामी गुरु है। इसमे गुरु, सूर्य, गुरु का प्रभाव है। मकर 276।40 से 280।00 अंश। नवमांश मीन। यह शारीरिक बल, भौतिकता, आध्यात्मिकता प्रचुर ऊर्जा का द्योतक है। जातक सुन्दर अंग, भूरे नेत्र, सुन्दर नाक, बहु मित्र व बन्धु वाला, गायक, कलाकार, इष्ट कर्म करने वाला होता है।

इस पाद में जातक आदर्शवादी, भावुक, कार्य के लिए ऊर्जावान, आध्यात्मिक, सलाहकार, दर्शन व्याख्याता, ईश्वर भक्त, गृह नगर से लाभी, संगीत प्रेमी, साथी-मित्र वाला होता है।

आचार्यो ने चरण फल सूत्र रूप में कहा है पर अंतर बहुत है।

यवनाचार्य : उत्तराषाढ़ा के प्रथम चरण मे राजा, द्वितीय चरण मे मित्रो का विरोधी, तृतीय चरण मे स्वाभिमानी, चतुर्थ चरण मे धार्मिक होता है।

मानसागराचार्य : पहले मे रक्त विकारी, दूसरे में अंगहीन, तीसरे में गुरुभक्त, चौथे मे शुभ लक्षण युक्त होता है।

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